Friday, August 3, 2012


Satya Sadhna  is not an activity designed to take us away from the problems of life; rather it helps us face them with our full capacity. Everybody has to deal with stress at some point - whether it's work, school or family life, our ability
 to deal with our circumstances is sometimes pushed to the limit. Dealing with circumstances that seem beyond our control can result in negative mood, anxiety or chronic stress. New studies have proven that Satya Sadhna actually improves mood and working memory - even in times of extreme pressure.

Thursday, August 2, 2012


Satya Sadhna takes us to the source of happiness, which is to be found in our own peace of mind. If we have no peace of mind and are constantly attacked by negative thoughts, happiness will remain elusive, no matter how successful we are on an outer plane.
It is perhaps hard to imagine that happiness can occur from the simple act of being. However, if we can meditate with a still mind, we will discover an unexpected source of happiness within our own self. Satya Sadhna shows us that happiness is not dependent on outer circumstances, but on our inner attitude.

Tuesday, June 19, 2012

अंतर्मुखी कला एवं सत्य साधना


व्यक्ति बाहर की दुनिया दास बना हुआ है। वह अपने चारों ओर की घटनाओं में व्यस्त रहता है। वह स्वयं से अनभिज्ञ है। उसे ज्ञान ही नहीं कि हमारा शरीर कैसा है, हमारा मन किस हाल में है। इसी अज्ञानता के कारण वह अपने जीवन से सन्तुष्ट एवं प्रसन्न नहीं है।
बहिर्मुखी स्वभाव के व्यक्ति को सतत प्रयासों के बाद भी कुछ प्राप्त नहीं होता। प्यासे मृग की भांति इधर-उधर दौड़ता-हांफता रहता है। यही कारण है कि संसार में तनावग्रस्त, चिड़चिड़े, असंतोषी, आसक्त, भयभीत, अहंकारी, स्वार्थी, र्इष्र्यालु, आलस्य की मूर्ति, राग-द्वेष से ग्रस्त व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है।
सत्य साधना व्यक्ति को  अंतर्मुखी जीवन जीने की कला सिखाती है। यह अनुभव के आधार पर प्रचलित पुरातन पद्धति है। सज्जन पुरुष ने इस साधना से अंतर्मुखी हो रहे हैं।
सत्य साधना के माध्यम से व्यक्ति को स्वयं अपने बारे में जानने का अवसर प्रशस्त होता है। बाहरी दुनिया से मन को हटाकर भीतर के संसार में झांकने लगता है। मन शरीर स्तर पर भी कर्इ-कर्इ अनुभव सामने आते हैं। शरीर मन एक-दूसरे से प्रभावित होते है l इस शोध कार्य में व्यस्त साधक को बाहरी वातावरण ललचाते नहीं। बाहरी घटनाएं दु:खी नहीं करती। यहां मिल रहे सुख में अपना संतुलन नहीं खोता।
हमारा सौभाग्य है कि अंतर्मुखी होने के लिए, अंतर्मुखी स्वभाव को सीखने हेतु हमारे पास सत्य साधना अपने मौलिक स्वरूप में उपलब्ध है। परम पूज्य गुरुदेव जैनाचार्य श्री जिनचन्द्र सूरि जी महाराज साहब ने अपने अथक परिश्रम के बल पर इस पद्धति को नितांत मौलिक रूप में संजोकर रखा है। आपश्री प्रयासरत हैं कि सभी जन वृद्ध, प्रौढ़, युवा, किशोर, बालवर्ग अंतर्मुखी बनने की यह जीवन कला सीख सकें। सबका मंगल हो सके।
आज हम संसार में मात्र सामान्य ज्ञान के लिए प्रतिदिन कर्इ-कर्इ घंटों को खर्च करते हैं। मगर ध्यान साधना से मिलने वाले गहरे, स्थायी एवं जीवनभर काम आने वाले अनुभव से दूर हैं। अंतर्मुखी जीवन कला सभी को मिल सके, यह कुशलायतन नाल में संभव हो रहा है।
मनुष्य अब इस के मूल्य को समझे। जब सब छोड़-छाड़कर यहां से कूच करना होगा। मन में रह जायेंगे ढेरों विकार, बंधन, निराशाभाव, राग-द्वेष के बंधन। और यह होगा बहिर्मुखी होने का दुष्परिणाम।
बहिर्मुखी जीवन में रहते हुए व्यकित आसक्त होता है। अपने मन को विकारों से ग्रस्त करता रहता है।
 अंतर्मुखी जीवन कला को साक्षात अनुभव करने के लिए जब व्यकित सत्य साधना करता है तो वह अपने मन को आसक्ति  से मुक्त करने का काम करता है। विकारों के मूल में आसक्त मन ही होता है अथवा यूं कहें कि आसक्ति  ही मन पर मैल की परतों पर परतें चढ़ाने वाला भयंकर विकार है। आसक्ति  का बंधन ही व्यक्ति को अन्य कर्इ बंधनों से जकड़ता है। सत्य साधना में अनासक्त मन का उदय होता है।
भ्रांति ये है कि बहिर्मुखी सज्जन ही तो जोड़-तोड़ व भागदौड़ करके परिवारजन का भला करेगा। मगर यह सत्य नहीं है। अंतर्मुखी व्यकित ही सही मायने में दूसरों का अच्छे से भला कर सकता है। क्यों कि उसके पास अनासक्त मन है।
 अंतर्मुखी व्यकित सत्य साधना से मिले गुणों की सहायता से परिवार, समाज, देश एवं विश्व पर आने वाली परेशानियों के निवारण में महती भूमिका निभाता है। परिवार में होने वाले विवादों को वह सहज निबटाने की क्षमता समाए होता है। परिवारजन के कष्टों को हटाने में, उनकी सार-संभाल ज़्यादा अच्छे से करने लायक बन जाता है। वह हर परिसिथति में समता में रहना सीखकर अपना भला तो करता ही है, साथ ही अपने आस-पास जन का भी भला करता है।
सत्य साधना को अपनाकर, आजमाकर एवं अनुभव कर कोर्इ भी काया पलट कर सकता है।  अंतर्मुखी होने का मार्ग खुला है।
सभी प्राणी निर्भय हों, निर्वैर हों, निर्लेप हों।
- जिन चन्द्र सूरि

Sunday, October 2, 2011

मुक्ति की राह

मानव यदि सत्य साधना को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाले,
तो वह मुक्ति की राह पर चल देता है .............

पहली सीढ़ी नम्रता

महान बनने की पहली सीढ़ी नम्रता है l 
नम्रता वह अमोघ अस्त्र है,
जो सफलता की राह दिखता है,
और मानव को देवता बना देता है l 

समता

गुण नहीं तो रूप व्यर्थ है ,
नम्रता नहीं तो शिक्षा व्यर्थ है l 
सदुपयोग नहीं तो धन व्यर्थ है ,
समता नहीं तो साधना व्यर्थ है l l